प्रदेश का भौतिक स्वरूप



Rajasthan gk important questions by jepybhakar

♦प्रदेश का भौतिक स्वरूपः-                 
प्रदेश को भौगोलिक स्वरूप के आधार पर चार भागो में बाँटा गया है-
1.उत्तरी-पश्चिमी मरूस्थलीय प्रदेश
2.अरावली पर्वतीय प्रदेश
3.पूर्वी मैदानी प्रदेश
4.दक्षिण पूर्वी पठार/हाड़ौती का पठार/लावा का पठार



1..उत्तरी-पश्चिमी मरूस्थलीय प्रदेशः-
 इसको थार का मरूस्थल (ग्रेट इंडियन डेजर्ट) भी कहा जाता है, जो कि टेथिस सागर का अवशेष है।
अरावली पर्वतमाला के पश्चिमी में स्थित इस प्रदेश को पश्चिमी रेतीली भूमि कहते है।
इसको मुख्यतः दो भाग- शुष्क मरूस्थल प्रदेश व अर्द्धशुष्क मरूस्थल प्रदेश में बाॅटा गया है।

 अर्द्धशुष्क मरूस्थल प्रदेश को पुनः 4 भागो में बाॅटा जाता है जो निम्न प्रकार है-

1. बांगर प्रदेश/शेखावाटी प्रदेश
2. घग्घर का मैदान
3.उच्च नागौरी प्रदेश
4.गोड़वाड़ प्रदेश/लूनी बेसिन।

 रेत के विशाल लहरदार टीलो को धोरे कहा जाता है। अर्द्ध चन्द्राकार आर्कति वाले विशेष टीले बरखान कहा जाता है।

 यह राज्य के कुल क्षैत्रफल का 61.11% है, जिसमें राज्य की 40.00% जनसंख्या निवास करती है।

इस प्रदेश में वर्षा 20 से 50 सेमी., शुष्क व अत्यधिक विषम जलवायु विषम जलवायु व मिट्टी रेतीली बलुई पाई जाती है।

थार विश्व की सर्वाधिक घनी आबादी व जनघनत्व वाला मरूस्थल है।

यहाँ सर्वाधिक जैव विविधता पाये जाने के कारण इस क्षैत्र को रूक्ष क्षैत्र कहा जाता है।

शेखावाटी क्षैत्र में स्थानीय भाषा कुए को जौहड़ तथा घास के मैदान को बीड़ कहते है।

कुब्बड़ पट्टी नागौर से अजमेर के बीच पाई जाती है।

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2.अरावली पर्वतीय प्रदेशः-
यह प्रदेश के कुल क्षैत्रफल का 9.00% क्षैत्र है, जिसमें प्रदेश की 11.00% जनसंख्या निवास करती है।

इसकी जलवायु उप आर्द्ध, वर्षा 50-90 सेमी. होती है।

अरावली पर्वतमाला गोड़वाना लैण्ड का अवशेष है।

अरावली पर्वत श्रृखला का शाब्दिक अर्थ चोटियों की पंक्ति है।


यह सबसे प्राचीनतम वलित पर्वतमाला की श्रृखला है, जिसका उद्भव केम्ब्रियन युग हुआ था।

यह संरचनात्मक दृ्ष्टि से अरावली पर्वतमाला देहली क्रम की है।

राज्य अरावली पर्वतमाला खेड़ब्रमा (सिरोही) से खेतड़ी (झुन्झुनू) तक फैली हुई है।

अरावली पर्वतमाला की कुल लम्बाई 692 किमी.( ) व राजस्थान में इनमें से 550 किमी लम्बाई है(खेड़ब्रमा (सिरोही) से खेतड़ी (झुन्झुनू))।

अरावली का सर्वाधिक विस्तार दक्षिणी राजस्थान या उदयपुर में तथा न्युनतम मध्य राजस्थान या अजमेर में हुआ है।

यह पर्वतमाला राजस्थान को दो भागो में बाटती है।

 यह भारत में महान जल विभाजक रेखा का काम करती है।

अरावली की चोटीयाँ क्रमशः गुरूशिखर (सिरोही, 1722/1727 मी., इसे कर्नल टाॅड ने सन्तो का टीला कहा), सेर (सिरोही, 4597 मी.), दिलवाडा़ (सिरोही,1442 मी.), जरगा(उदयपुर, 1431 मी.), अचलगढ़ (सिरोही, 1380 मी.), रघुनाथगढ़(सीकर, 1055), खौ। (नोट:- वर्तमान में इनका क्रम दुसरा है जो आपको अतिशिघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा।)

अरावली पर्वतमाला की समुद्रतल से औसत उँचाई 930 मीटर है।

अरावली का कामलीघाट राजसंमद-पाली में तथा केवड़ा की नाल, उदयपुर में है।

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3.पूर्वी मैदानी प्रदेशः-
यह प्रदेश के कुल क्षैत्रफल का 23.00% है, जहाॅ प्रदेश की 39.00%  जनसंख्या निवास करती है।

यह आर्द्र जलवायु, जलोढ़ दोमट मिट्टी (सर्वाधिक उपजाऊ), वर्षा 50 से 80 सेमी. है।

इसको मुख्यता चार भागो में बाँटा जाता है-
(अ). चम्बल बेसिनः- सर्वाधिक बीहड़ इसी बेसिन के सवाईमाधोपुर जिले में पाया जाता है।
(ब). माही बेसिन
(स). बनास बेसिन
(द). बाण गंगा का मैदानः-यह मैदान उतर में मालपुरा करौली का मैदान व दक्षिण में मेंवाड़ का मैदान कहलाता है।

4.दक्षिण पूर्वी पठार/हाड़ौती का पठार/लावा का पठारः-
यह अरावली पर्वतमाला व विध्याचल पर्वतमाला के मध्य स्थित है।

यहाँ राज्य के कुल क्षैत्रफल का 6.89% क्षैत्र पर 11.00% राज्य की जनसंख्या निवास करती है।

यहाँ काली मिट्टी, अतिआर्द्र जलवायु, 80 से 120 सेमी. वर्षा है।

इस क्षैत्र में सर्वाधिक खनिज पाये जाते है।

मुकुंदरा की पहाड़ियाँ कोटा व झालावाड़ जिले में फैली होती है।

♦राजस्थान को जलवायु (वर्षा को भी) के आधार पर 5 भागौ में बाँटा गया है-

जलवायु - किसी भु-भाग पर लम्बी अवधि के दौरान विभिन्न समयों में विविध मौसमों की औसत अवस्था उस भू-भाग की जलवायु कहलाती है।

राजस्थान उष्ण शीतोष्ण कटिबंध में आता है, तो तापमान की दृष्टि से राज्सथान गर्म शीतोष्ण कटिबंध में आता है, कयोकि राजस्थान का अधिकाश भाग कर्क रेखा के उतर में स्थित है।

राज्य या देश सबसे लम्बा दिन 21 जून, सबसे छोटा दिन 22 दिसम्बर, सबसे ठण्डा दिन 22 दिसम्बर, सबसे गर्म दिन 21 जून है।

राजस्थान की वार्षिक वर्षा का 58 सेमी./57.7 सेमी. व वार्षिक औसत तापमान 38 डिग्री से. है।

राजस्थान में सर्वाधिक ठण्डा महिना जनवरी, गर्म महिना जुन व सर्वाधिक आपेखिक आर्द्रता पुलाई से सितम्बर
माह तक होती है।

राजस्थान के जुलाई माह में वायुदाब मानचित्र में 999 मिली बार रेखा जालौर, पाली, अजमेर, टोंक आदि जिलो से गुजरती है।

राज्य में सर्वप्रथम बरसात अरब सागरीय मानसून से तथा सर्वाधिक वर्षा बंगाल की खाड़ी के मानसुन  से होती है।

पुष्कर पहाड़ियों में भारी बर्षा होने से बालोतरा में बाढ़ आ जाती है।

राजस्थान नयुनतम ग्रीष्मकालीन तापमान वाला क्षैत्र दखिणी-पूर्वी राजस्थान है, तो पश्चिमी राजस्थान का सूखा मौसम है।

राज्य में जुलाई से सितम्बर के दौरान 90 प्रतिशत वर्षा/वृष्टि होती है।

राज्य में शीतकालीन में होने वाली वर्षा (मावठ) पश्चिमी विक्षोभ (उतरी-पश्चिमी हवाओ) की उत्पति भुमध्य सागर एवं केस्पीयन सागर से होती है।

राजस्थान में मानसून वर्षा दक्षिण-पश्चिमी से उतर-पूर्व की ओर बढ़ती है, तो राजस्थान में उतर-पश्चिम से दक्षिण पुर्व की ओर राजस्थान में वर्षा की मात्रा वृद्धि होती है।

राज्य का सर्वाधिक शुष्क स्थान फलौदी (जोधपुर), सर्वाधिक ठण्डा व गर्म जिला चूरू, सर्वाधिक गर्म चुरू व
सर्वाधिक ठण्डा स्थान माउण्ट आबु(सिरोही) (माउण्ट आबु को राजस्थान का बर्खोयान्सक भी कहा जाता है, क्योकि विश्व का सबसे ठण्डा स्थान रूस में बर्खोयान्सक है।)

न्युनतम तापान्तर वाला स्थान माउण्अ आबु व अधिकतम तापान्तर वाला जिला चुरू व नयुनतम तापान्तर वाला जिला डुगरपुर है।

राज्य का सर्वाधिक कम व अधिक वर्षा वाला स्थान क्रमशः सम (जैसलमेर) व माउण्ट आबु है।

राजस्थान का सर्वाधिक व न्युनतम वर्षा वाला जिला क्रमशः झालावाड़ व जैसलमेर है।

सर्वाधिक आर्दता वाला जिला व स्थान क्रमशः झालावाड़ व माउण्ट आबु है।

राज्य का सर्वाधिक शुष्क स्थान फलौदी (जोधपुर) व जिला जैसलमेर है।

सर्वाधिक जलवायु विषमता वाला जिला जैसलमेर है।
सर्वाधिक व न्युनतम आँधियों वालें जिले क्रमशः श्रीगंगानगर व झालावाड़ है।

सुर्य की सर्वाधिक तिरछी किरणें श्रीगंगानगर व सीधी किरणें बाँसवाड़ा जिले में पड़ती है।

सर्वाधिक वर्षा वाला दुसरा जिला बाँसवाड़ा है।


जैसलमेंर व इसके आसपास के इलाके मेकं जलग्रहण की परम्परागत विधी को खड़ीन कहते है।

राजस्थान को 50 सेमी वर्षा रेखा ओ भागो पूर्वी व पश्चिमी राजस्थान में बाँटती है।

25 सेमी. वर्षा रेखा राज्य के रेगिस्तान को दो भागो (शुष्क मरूस्थलीय प्रदेश व अर्द्धशुष्क मरूस्थलीय प्रदेश) में बाँटती है।

भारतीय मौसम विभाग की वैधशाला राज्य के जयपुर में स्थित है।

1. शुष्क जलवायु प्रदेशः- 0 से 20 सेमी. वर्षा (सूखा प्रदेश), वनस्पति रहित प्रदेश(सम, जैसलमेर), औसत तापमान- गर्मी में 34 से 40 डिग्री सेल्सियस, सर्दी में 12 से 16 डिग्री सेल्सियस, होता है। यह प्रदेश मुख्यता थार के मरूस्थल के पश्चिमी भाग में फैला हुआ है। यहाँ गर्मियों धुल भरी आधियाँ (सर्वाधिक गंगानगर) व लू चलती है।

2. अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेशः- इसकी जलवायु प्रदेश वर्षा 20से 40 सेमी. ( आधा सुखा), औसत तापमान- गर्मी में 30 से 36 डिग्री सेल्सियस, सर्दी में 10 से 17 डिग्री सेल्सियस रहता है। इस प्रदेश में कांटेदार झाडीयाँ व घास (स्टेपी प्रकार की घास) पायी जाती है।

3. उपआर्द्र शुष्क जलवायु प्रदेशः- इसमें वर्षा 40 से 60 सेमी., तापमान- गर्मी में 28 से 34 डिग्री सेल्सियस, सर्दी में 12 से 18 डिग्री सेल्सियस, व स्टेपी प्रकार के पतझड़ व विरल वनस्पति पाई जाती है। पूर्वी राजस्थान की जलवायु परिस्थितियाँ सामान्यतः नम होती है। 

4. आर्द्र जलवायु प्रदेशः- इसमें वर्षा 60 से 80 सेमी., तापमान- गर्मी में 32 से 35 डिग्री सेल्सियस, सर्दी में 14 से 17 डिग्री सेल्सियस, व वन सघन वनस्पति व पतझड़ वन पाये जाते है।

5. अतिआद्र्र्र जलवायु प्रदेशः-  इसमें वर्षा 80 से 120 सेमी., तापमान- गर्मी में 30 से 34 डिग्री सेल्सियस, सर्दी में 12 से 18 डिग्री सेल्सियस, व व वनस्पति मानसूनी सवाना व सदाबहार पाई जाती है।

♦राजस्थान की अपवाह प्रणाली को तीन भागो में बाँटा में गया है-

राजस्थान की दो नदीयां सरस्वती नदी (घग्घर नदी) व द्वेषवती नदी (जयपुर में बहती थी, जिसका अवशेष अमानीशाह नाला हैं। यह जयपुर की लाइफ लाइन है।) का वर्णन ऋग्वेद में मिलता है।

राज्य के बीकानेर व चुरू जिले में कोई नदी नहीं  बहती है।

नदीयो को जोड़ने से संबधित योजना अमृत क्रांति है, तो भारतीय इंजीनीयर मोक्षमुण्डम विश्वेश्वरैया को राजस्थान में नदी जोड़ने का जनक कहा जाता है।

1.अन्तः प्रवाह वाली नदीयां:-
आन्तरिक प्रवाह की दृष्टि से सबसे लम्बी व छोटी नदी क्रमशः घग्घर (4़65 किमी.) व कांकणी (17 किमी.) नदी है।राजस्थान में पूर्ण की दृष्टि से से आन्तरिक प्रवाह की सबसे लम्बी कांतली नदी (100 किमी.) है।

घग्घर नदी- इसका उद्गम हिमाचल प्रदेश की शिवालिक पहाड़ी(कालका माता के तंदिर के पास) से तथा वर्षा के दिनों में उफान पर होने पर इसका पानी फोर्ट अब्बास (पाकिस्तान) तक चला जाता  है। पाकिस्तान में इसका बहाव क्षैत्र हकरा कहलाता है। राजस्थान में टिब्बी नामक स्थान से प्रवेश करती हैं। इससे थोड़ी दुर तलवाड़ा झील (राजस्थान की सबसे नीची झील)। इसे नट नदी/मृत नदी/सोतर नदी/सरस्वती नदी/द्वेषवती नदी/राजस्थान का शोक/लेटी हुई नदी आदि नामों से जाना जाता है। यह आन्तरिक प्रवाह की दृष्टि से सबसे लम्बी (4़65 किमी.) नदी है।इस नदी किनारे हनुमानगढ़  जंक्शन का धरातल स्थल उसके पास की नदी के पेटे के स्तर से भी नीचे है। इसका राज्य बहाव क्षैत्र नाली/पाट कहलाता है।

कांकणी नदीः- उद्गम कोठारी (जैसलमेर), विलुप्त मीठा खाड़ी(जैसलमेर), यह जैसलमेर में बुझ झील का निर्माण करती है। इसे कांकनेय व स्थानीय भाषा में मसूरदी नदी कहते हैं। यह आन्तरिक प्रवाह की सबसे छोटी(17 किमी.) नदी हैं।

साबी नदीः- उद्गम सेवर के पहाड़ियों से, विलुप्त  पटौदी (गुड़गांव,हरियाणा) में। अलवर जिले की सबसे बड़ी नदी।

रूपनगढ़ नदीः- उद्गम सलेमाबाद (किशनगढ़), विलुप्त सांभर झील में।
मेन्था नदीः- उद्गम मनोहरपुर, विलुप्त सांभर झील में।


कांतली नदीः- उद्गम खण्डेला की पहाडीयों (रैवासा) से, विलुप्त चुरू की सीमा पर। इसका बहाव क्षैत्र तोरावाटी
कहलाता है। इसे मौसमी नदी भी कहा जाता है। राजस्थान में पूर्ण की दृष्टि से से आन्तरिक प्रवाह की सबसे लम्बी नदी (100 किमी.) है। इसके किनारे गणेश्वर सभ्यता विकसित हैं। यह झुंझुनू को दो भागो में विभाजित करती है।

रूपारेल नदीः- उद्गम उदय नाथ की पहाड़ी (थानागाजी, अलवर) से, विलुप्त- सीकरी बाँध भरतपुर में। इसे लसवारी नदी व स्थानीय भाषा में वराह नदी कहा जाता है।

♦अरब सागर की ओर बहने वाली नदीयांः-

माही नदीः- उद्गम- मध्यप्रदेश के धार जिले की अमरोरू पहाड़ी के सरदारपुरा के निकट मेहद झील से। इसे आदिवासियों की गंगा, बांगड़ की गंगा, काँठल की गंगा, दक्षिणी राजस्थान की स्वर्ण रेखा आदि नामों से जाना जाता है। माही नदी से  सुजलाम-सुफलाम क्रांति सम्बधित है। माही नदी त्रिवेणी संगम (सोम, माही, जाखम नदी का) बेणेश्वर (डंुगरपुर) बनाती है। इसकी कुल लम्बाई  576 किमी. व राज्य में 171 किमी. है। माही नदी कर्क रेखा को दो बार काटती है। माही नदी डुंगरपुर व बांसवाड़ा की सीमा का निर्धारण करती है।

सोम नदी-
उद्गम- ऋषभदेव के बाबलवाड़ा के जंगल की बीछामेड़ा पहाड़ी से। माही व जाखम के साथ बेणेश्वर
(डंुगरपुर) में त्रिवेणी संगम।

जाखम नदी- उद्गम- प्रतापगढ़ की छोटी सादड़ी में भँवर माता के मन्दिर की पहाड़ी से। सोम व माही के साथ बेणेश्वर (डंुगरपुर) में त्रिवेणी संगम।

पश्चिमी बनास- उद्गम- सिरोही के नया सोनवारा गांव के निकट से।

साबरमती नदी- उद्गम- पदराडा(उदयपुर) से। राज्य की एकमात्र नदी जिसका उद्गम राजस्थान से होता है, परन्तु महत्व गुजरात के लिए है। इसकी कुल लम्बाई 416 किमी. व राज्य में 45 किमी. बहती है।

लूनी नदी- उद्गम- अजमेर के नाग पहाड़। इसका प्रचीन नाम लवणमती, पुष्कर के पास साक्री नदी, उद्गम स्थल अजमेर से सरगावती/सागरमती नदी, जालौर में रेल/नाड़ा, मीठी-खारी नदी, मरूस्थल की गंगा, पश्चिमी राजस्थान की सबसे लम्बी नदी आदि नामों से जाना जाता है। इसका जल बालोतरा तक मीठा इसके पश्चात खारा हो जाता है, क्यौकि बालोतरा का धरातल स्थल उसके पास की नदी के पेटे के स्तर से भी नीचा हैं। इसका प्रवाह क्षैत्र गोड़वाड़ प्रदेश कहलाता है। इसकी कुल लम्बाई 495 किमी. में से राज्य में 330 किमी. में बहती है। सहायक नदीयां- मीठड़ी, सुकड़ी, जवाई, सागी व जोजड़ी नदी हैं।

सागी नदी- उद्गम- जालौर के जसवन्तपुरा की पहाड़ी से।

जवाई नदी- उद्गम- पाली जिले की बाली तहसील की गौरया गांव से।

सुकड़ी नदी- उद्गम- देसूरी, पाली के पास से।

मीठड़ी नदी-

जोजड़ी नदी-
उद्गम- पाड़लु गांव नागौर। लूनी की एकमात्र सहायक नदी जो लूनी नदी में दाँए किनारे से मिलती है व जिसका उद्गम अरावली के पहाड़ीयो से नहीं होता है।

♦प्रदेश से बंगाल की खाड़ी की ओर गिरने वाली नदीयां-

जलप्रताप-1. चूलिया जलप्रताप-भैंसरोड़गढ़ (चितौड़गढ़) में चमबल नदी पर।
2.भीमतल जलप्रताप-भीमतल (बूंदी) माँगली नदी पर।
3. मेनाल नदी-मेनाल (भीलवाड़ा) मेनाल नदी व ऊपरमाल पठार से।
4.अरणा-जरणा जलप्रताप-जोधपुर में,
5.दमोह जल प्रताप-धोलपुर में।

राजस्थान के लोकदेवता (एक बार जरूर जाने) जानने लिए क्लिक करें।

चम्बल नदी- उद्गम- मध्यप्रदेश् के इन्दौर जिले के महु के निकट जानापाव की पहाड़ी से। इसे चर्मण्वती नदी, राजसथान की कामधेनु, बारहमासी नदी, नित्यवाही नदी आदि नामों से जाना जाता है। एकमात्र नदी जो राजस्थान व मध्यप्रदेश की  अन्तर्राज्यीय सीमा बनाती है। विश्व की एकमात्र नदी जिसके 100 किमी. के दायरे में तीन बाँध (गाँधी सागर बाँध, राणाप्रताप सागर बाँध, जवाहर सागर बाँध) बनाये गये हैं और तीनों पर ही जल विधुत उत्पादन ेिकया जाता हैं। राज्य में चम्बल के द्वारा ही सर्वाधिक अवनलिका अपरदन होता हैं। इसकी प्रवाह प्रणाली वृक्षाकार व बहाव दक्षिण से उतर की ओर है। यह राज्य की बहाव क्षैत्र की दृष्टि से सबसे लम्बी नदी है। इसकी कुल लम्बाई 965/966 किमी. मंे से राज्य में 135 किमी. बहती हैं। यह 241 किमी. अन्तर्राज्यीय सीमा बनाती है। सहायक नदीयां- पार्वती नदी, मेज नदी, बनास नदी आदि। यह             में यह यमुना नदी में मिल जाती हैं।

मेज नदी- उद्गम- बिजौलिया भीलवाड़ा से।

पार्वती नदी-
उद्गम- मध्य प्रदेश के सेहोर क्षैत्र से। यह राजस्थान में प्रवेश करयाहाट, बांरा नामक स्थान से। यह पालिया, कोंटा में चम्बल नदी में मिल जाती है।

बाणगंगा नदी- उद्गम- जयपुर जिले की बैराठ की पहाड़ी से। इसे अर्जुन की गंगा व ताला नदी कहा जाता है। इसके किनारे बैराठ सभ्यता विकसित है। यह राज्य की जो अपना पानी सीधा यमुना नदी (फतेहाबाद, आगरा) में डालती है। इसकी कुल लम्बाई 380 किलोमीटर हैं।

बनास नदी- उद्गम- खमनोर की पहाड़ी कुम्भलगढ़ से। इसे वर्णाशा नदी, वशिष्टि नदी व वन की आशा आदि नामों से जाना जाता है। यह राज्य मंे पुर्ण बहाव की दृष्टि से सबसे लम्बी नदी है। इसकी कुल लम्बाई 480 किमी. है। इसका जलग्रहण सर्वाधिक है। इस पर तीन त्रिवेणी संगम बनते है-
1. बींगोद, भीलवाड़ा में मेनाल, बनास व बेड़च नदी द्वारा बनाया जाता हैं।
2. देवली के निकट बीसलपुर, टोंक में डाई, खारी, बनास नदी द्वारा बनाया जाता है।
3. रामेश्वरम्, सवाईमाधोपुर में चम्बल, बनास व सीप नदी द्वारा बनाया जाता है। मेनाल झरना भीलवाड़ा व

चितौड़गढ़ जिलो की सीमा पर स्थित है। यह सवाईमाधोपुर के खण्डार गांव में रामेश्वरम् नामक स्थान में चमबल नदी मिलती हैं। इसकी सहायक नदीयां बेड़च, मेनाल, कोठारी, खारी, मेनाल व डाई नदी है।



बेड़च नदीः- उद्गम-गोगुन्दा की पहाड़ी से इस नदी को उदय सागर झील से पहले आयड़ नदी व इसके पश्चात इसे बेड़च नदी कहा जाता हैं। इसके किनारे आहड. सभ्यता विकसित हुई है। इसकी लम्बाई 190 किमी. हैं। यह बींगोद, भीलवाड़ा में मेनाल व बनास के साथ मिलकर त्रिवेणी संगम बनाती है।

कोठारी नदीः-
उद्गम- दिवेर की पहाड़ी कुम्भलगढ़ से।

खारी नदीः- उद्गम- बिजराल की पहाड़ी से।

डाई नदीः- उद्गम- अजमेर के भिनाई के पास से।

मेनाल नदीः- उद्गम- माण्डलगढ़ की पहाड़ी से।

गम्भीरी नदीः- उद्गम- जावद गाँव (मध्यप्रदेश) व चितौड़गढ़ के पास बेड़च में मिलती है।

गम्भीर नदीः- उद्गम- गंगापुरसिटी से। इटावा के पास यमुना में विलय।

आहु नदीः- उद्गम- सुसनेर (मध्यप्रदेश) से, व राजस्थान में प्रवेश नन्दपुर गाँव (झालावाड़) में से। यह गागरोन के किले के पास कालीसिंध में मिल जाती है। गागरोन का किला (झालावाड़) कालीसिंध व आहु नदी के संगम पर ही स्थित है।

कालीसिंध नदीः- उद्गम- देवास (मध्यप्रदेश) के बागली गाँव की पहाड़ी से। राजस्थान में प्रवेश रायपुर गाँव (झालावाड़) में, व नानेरा, कोटा में यह चम्बल नदी में गिर जाती है।

रवन नदीः- उद्गम- मध्यप्रदेश के मालवा के पठार से। राजस्थान में प्रवेश खरीबोर गाँव (झालावाड़) में। यह रामगढ़ कोटा में कालीसिंध नदी में मिल जाती है। इसी नदी पर बारां जिले में परवन परियोजना शुरू की गई है।


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