(8) Rajasthan GK One Liner Questions Answers PDF by jepybhakar

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सरिस्का स्थित कांकनवानी किले का निर्माण, सवाई जयसिंह ने करवाया था।(यह दुर्ग प्रसिद्ध सरिस्का वन्य जीव अभ्यारण के घने जंगल में स्थित है।)

इतिहासका सी.वी.वैद्य के अनुसार राजपूत की उत्पत्ति वैदिक आर्यों से हुई है।

कवि चंद्रवरदाई के अनुसार 'महर्षि वशिष्ठ' द्वारा आबू पर्वत पर किए गए अग्निकुंड से राजपूतों के चार वंशों की उत्पत्ति हुई है।

अचलेश्वर मंदिर के अभिलेख में चौहानों को चंद्रवंशी बताया गया है

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इतिहासकार 'डॉ गौरी ओझा' और 'डॉ दशरथ शर्मा'राजपूतों को भारतीय प्राचीन क्षत्रियों की संतान मानते हैं।

'नागभट्ट द्वितीय' गुर्जर प्रतिहार शासक ने कन्नौज को अपने राज्य की राजधानी बनाया था।

कन्नौज में प्रतिहार वंश के शासन की नींव नागभट्ट प्रथम ने रखी थी।
(नागभट्ट प्रथम को 'नागावलोक' नाम से भी जाना जाता है । इसने 730 ईसवी के आसपास अपने वंश का शासन स्थापित किया तथा उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया।)

कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार वंश की शक्ति मिहिर भोज शासक के मसाला दाल बाटी और प्यार समय अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंची थी ।

प्रसिद्ध कवि व राजशेखर राजशेखर 'महेंद्रपाल प्रथम' प्रतिहार शासक का गुरु था।

आठवीं से 10 वीं शताब्दी तक राजस्थान में प्रतिहार वंश का (राजपूत वंश का) वर्चस्व रहा।

जोधपुर के निकट ओसियाँ मे स्थित मंदिर प्रतिहार राजवंश की देन है।

ओसिया (जोधपुर) में महावीर स्वामी को समर्पित जैन मंदिर का निर्माण 'वस्तराज प्रतिहार' राजा के काल में हुआ था।

इतिहासकार आर सी मजूमदार के अनुसार, गुर्जर प्रतिहारों ने छठी शताब्दी से 11 वीं शताब्दी तक अरब आक्रमणकारियो लिए बाधक का काम किया था।

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कालभोज बापा रावल को आटपुर अभिलेख में सूर्य के समान तेजस्वी बताया गया है।

चित्तौड़ किले,को जीतने के क्रम में अकबर को जयमल एवम पत्ता के प्रबल प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था।

हल्दीघाटी के युद्ध पश्चात महाराणा प्रताप में कुंभलगढ़ मे अपनी राजधानी स्थापित की पन्नाधाय ने अपने पुत्र का बलिदान देकर राजकुमार गेसिंग की जान बचाई थी।

हल्दीघाटी के युद्ध को,अब्दुल फजल ने खमनोर का युद्ध कहा था।

राजस्थान में मुस्लिम सत्ता के प्रसार का सर्वाधिक श्रेय अलाउद्दीन खिलजी को जाता है।

हल्दीघाटी के युद्ध में मुगलों और महाराणा के सैनिकों के साथ साथ दोनों पक्षों की लूणा, रामप्रसाद, गजमुक्त और गजराज हाथियों ने बहुत वीरता दिखाई थी।

मेवाड़ महाराणा अमर सिंह के समय हुई मेवाड़-मुगल संधि के बाद मेवाड़ के 'महाराणा राजसिंह शासक' के समय पुनः मुगलों का प्रतिरोध शुरू हो गया था। (महाराणा राजसिंह 10 अक्टूबर, 1652 को मेवाड की राजगद्दी पर बैठे। इन्होंने प्रारंभ से ही मुगल बादशाह औरंगजेब का विरोध करना शुरू कर दिया था तथा उसके द्वारा लगाए गए 'जजिया कर' का विरोध किया।)

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चित्तौड़गढ़ के दुर्ग में स्थित कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति का रचयिता 'अत्री- महेश' था।

सन 1468 में मेवाड़ के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना घटित हुई, वह थी महाराणा कुंभा कि उनके पुत्र उदा द्वारा उनकी हत्या।

अकबर की सेना का महाराणा प्रताप के विरुद्ध अंतिम असफल अभियान दिसंबर,1584 में हुआ था।
(अकबर ने आमेर के शासक भारमल के पुत्र जगन्नाथ कच्छावा के नेतृत्व में यहां सेना भेजी थी जिसे कोई सफलता नहीं मिली। इसके बाद उसने 10 वर्षों तक प्रताप के विरुद्ध कोई सैन्य अभियान नहीं भेजा।)


सन 1517 ईसवी में महाराणा सांगा और दिल्ली सुल्तान इब्राहिम लोदी के बीच हाडोती की सीमा पर' खातोली का युद्ध' हुआ था।

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मेवाड़ के 'महाराणा सांगा शासक' ने सिरोही बागड़ तथा मारवाड़ की राजपूत शासकों से मैत्री कर मुस्लिम शासकों के विरुद्ध राजपूत राज्यों के मैत्री संघ का गठन किया।

हल्दीघाटी के युद्ध से पूर्व बादशाह अकबर ने महाराणा प्रताप से संधि करने हेतु अंतिम रूप से राजा टोडरमल को अपना दूत बनाकर भेजा था।

'महाराणा संग्राम सिंह' राजपूत शासक को अंतिम भारतीय हिंदू सम्राट के रूप में स्मरण किया जाता है।

मेवाड़ के इतिहास में राजमहलों की प्रथम क्रांति,"महाराणा उदयसिंह की मृत्यु के बाद उनके द्वारा बनाए गए उत्तराधिकारी जगमाल सिंह के विरुद्ध जाकर प्रमुख सरदारों द्वारा सही उत्तराधिकारी महाराणा प्रताप को राज सिंहासन पर बैठाना " को कहा गया है।

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