राजस्थान की कला संस्कृति (राजस्थानी चित्रकला शैली) Part-3

Rajasthani art and culture Notes

Rajasthani art and culture (राजस्थानी चित्रकला शैली) Part-3

दोस्तों हम राजस्थान की कला संस्कृति (Rajasthan ki kala sanskriti) में राजधानी चित्रकला शैली का अध्ययन करेगे, जिसमें आपको कोटा चित्र शैली, बुँदी शैली, किशनगढ़ शैली व नागौर शैली का अध्ध्यन करेगें, जिससे आपको राजस्थानी कला एवं सस्कृति  (Rajasthani art and culture) को समझने में मदद मिलेगी।

कोटा चित्र शैली :-

  • राजा रामसिंह (1669-1705) के समय कोटा चित्रशैली का प्रादुर्भाव हुआ।
  • कोटा के महाराजा माधवसिंह में वीरोंचित गुणों का समावेश हुआ था। साथ ही वे कलाओं, विशेषतः चित्रकला के प्रति विशेष आसक्त थे। अतः उनके काल मेें कला और कलाकारों को पुर्ण आशय प्राप्त हो सका।
  • सर्वाधिक विकास का श्रेय महारावल रामसिंह को जाता है।
  • इस शैली का स्वर्णकाल उम्मेदसिंह का काल।
  • चित्रकार – रघुनाथ, गोविन्दराम, डालू, लच्छीराम, नूरमोहम्मद।
  • रंग – हल्के हरे, पीले और नीले रंग का प्रयोग बहुतायत से। प्रकृति परिवेश का चित्रण रतरंगा है।
  • कोटा शैली पर वल्लभ सम्प्रदाय का पूर्ण प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।
  • राजा महाराओं के पोट्रकट्स, युद्ध दर्शन आखेट, धार्मिक प्रसंगो, दरबारी दृश्यों-जुलूसों के विषय के चित्रांकन के साथ ही रागमाला, बारहमासा तथा श्रीकृष्ण की लीलाओं इत्यादि का चित्रण।
  • युद्ध व शिकार के दृश्यों का महत्वपुर्ण चित्रांकन। नारियों/रानीयों को भी शिकार करते हुए दिखाया गया है।
  • सन् 1768 में डालू नाम के चित्रकार द्वारा चित्रित रागमाला सैट कोटा कलम का सर्वाधिक बड़ा सचित्र रागमाला सेट है।
  • लघुचित्र गं्रथ, ढोला-मारू सचित्र ग्रंथ विशेष महत्वपुर्ण ग्रंथ है।
  • 18वीं तथा 19वीं सदी के संधिकाल में कोटा की लघु चित्रकला ने विशेष उन्नति की। इस समय इसे महाराजा छत्रसाल व महाराजा रामसिंह का संरक्षण मिला।
  • चम्पा, सिंह, मोर, उमड़ते-घुमड़ते बादल प्रमुखतः चित्रित है।

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Rajasthani art and culture (राजस्थानी कला एवं सस्कृति )

बुँदी शैली :-

  • प्रारम्भ 17वीं शताब्दी के प्रारंभ में।
  • सर्वाधिक विकास सुर्जन सिंह के समय।
  • चित्रकार – सुरजन, अहमद अली, रामलाल, श्रीकृष्ण इत्यादि।
  • विशेषता – नुकीली नाक, मोटे गाल, छोटा कद, लाल पीले रंग का प्रयोग।
  • चित्रण- रागरागिनी, नायिका भेद, ऋतु वर्णन, बारहमासा, रसिकप्रिया, मतिराम के रसराज पर आधारित चित्र।
  • रंग – हरा रंग प्रधान। लाल हिंगुल के चमकदार हाशियों सहित स्वर्ण रेखाओं से सीमित है।
  • दीपकराज तथा भैरव रागिनी के चित्र राव रतनसिंह (1607-31) के समय में निर्मित हुए।
  • राजा अनिरूद्ध सिंह के समय में दक्षिण युद्धो के फलस्वरूप दक्षिण कलाओं का भी प्रभाव स्पष्ट देखने को मिलता है।
  • इस शैली के प्रायः सभी चित्रों में लोकजीवन की छाप देखने को मिलती है।
  • महाराव उम्मेद के शासन में निर्मित चित्रशाला बूँदी शैली का श्रेष्ठ उदाहरण है।
  • इस चित्रशाला को भिति चित्रों का स्वर्ग कहते है।
  • बंूदी शैली राजस्थान की एकमात्र शैली है, जिसमें मोर के साथ सर्प का चित्रण है।
  • शिकार तीज – त्यौहार व अन्य उत्सव, हाथियों की लड़ाई, रंगारंग व व्यक्ति चित्रों का अंकन इस शैली में मिलता है।
  • ईरानी, दक्षिणी, मराठा व मेवाड़ चित्रशैली से प्रभावित।
  • पशु-पक्षियों का चित्रण बहुलता से। मयूर, हाथी, हिरण का चित्र अधिक।
  • सरोवर, केले व खजूर के वृक्ष त्ु ज6 था सुनहरे, लाल व पीले रंग के बादल।
  • नारी – तन्वंगी, अधर अरूण, आंखे आम्रपत्र के समान, मुख गोलाकार और चिबुक पीछे की ओर झुकी, ग्रीवा छोटी और बांहे लम्बी। पारदर्शी वस्त्र व लाल चुनरी।
  • पुरूष – कद लम्बे, शरीर पतले, बड़ी मूछे, ललाट कुछ गोलाकार। अधर स्त्रियों जैसे अरूणिमायुक्त। झुकी पगड़ी व पारदर्शक जामें।

Rajasthani art and culture (राजस्थानी कला एवं सस्कृति ) के नोटस की PDFआपको लास्ट में मिल जायेगी, जिसे डाउनलोड जरूर कर लीजिए-

किशनगढ़ शैली :-

  • इस शैली का प्रारम्भ 18वीं सदी के मध्य हुआ।
  • राज्य में वल्लभ सम्प्रदाय के प्रभाव के कारण कृष्ण भक्ति को स्वीकारा गया।
  • इस शैली को कागज शैली भी कहा जाता है।
  • चित्रकार – छोटू, अमिरचन्द, निहालचन्द, धन्ना इत्यादि।
  • स्वर्णकाल सांवतसिंह के समय से शुरू हुआ। सांवतसिंह नागरीदास के नाम से भी जाने जाते है।
  • बणी-ठणी – बणी-ठणी की चित्रकारी नागरीदास के समय प्रसिद्ध चित्रकार मोरध्वज निािलचंद द्वारा बनाई गई। सांवत सिंह ने प्रेयसी बणी-ठणी के अपूर्व प्रेम से प्रेरित होकर अनेक चित्र बनवाए।
  • बणी-ठणी के नाक आभुषण को बेसरि कहा जाता है।
  • किशनगढ़ शैली को विश्व में प्रकाशित करने का श्रेय 1943 में एरिक्डिसन को जाता है। इन्होने सर्वप्रथम किशनगढ़ शैली की प्रसिद्ध कृति बणी-ठणी को भारतीय कला की मोनालिसा के रूप में स्थापित किया।
  • इस शैली में चांदनी रात की संगोष्ठी नामक चित्र अमरचंद ने चित्रित किया।
  • इस शैली में तुलिका का सुयोजित एवं गुलाबी हल्के रंगों का प्रयोग बड़ा ओजपूर्ण है।
  • किशनगढ़ के राजा सांवतसिंह ’नागरीदास’ ने मनोरथ मंजरी, रसिक रत्नावली व बिहारी चन्द्रिका की रचना की। इनकी प्रेयसी बनीठणी स्वयं ’रसिक बिहारी’ नाम से रचनाएं करती थी।
  • इस शैली में सफेद, गुलाबी सिंदुरी रंगों में केले के वृक्ष, झीलों के दृश्य, हंस, बतख, सारस, बगुला, तैरती हुई नौकाएं, प्रेमालाप करते राधा-कृष्ण का सुन्दर चित्र चित्रित किया गया।
  • नूकीली नाक, लम्बा चेहरा, लम्बा कद, सुराहीदार गर्दन, पतली कमर, काजल युक्त नयन, खिंचा हुआ वक्षस्थल और पारदर्शी वस्त्रों का अत्यधिक सुन्दर चित्रण इस शैली की प्रमुख विशेषता है।

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अजमेर चित्रशैली :-

  • राजस्थान की विश्वविख्यात लघु शैलीयों में अजमेर चित्र शैली का उल्लेखनीय स्थान रहा है।
  • यह राजकीय संरक्षण में पलने के साथ-साथ आम आदमी के सहयोग से विकसित हुई।
  • राजमहल के साथ साथ गरीब की झोपड़ी तक में इस शैली की उल्लेखनीय कृतियों का निर्माण हुआ।

बीकानेरी शैली :-

  • बीकानेर शेली का शुभारम्भ 1600 ई. भागवत पुराण के चित्रों का मानते है।
  • राग मेघ मल्हार का 1606 ई. में चित्रित चित्र को भी बीकानेर शैली का माना जाता है।
  • चित्रकार – रूकनुद्दीन, शहाद्दीन, रशीद, नूर मोहम्मद, गूटसयाली, मूराद, गंगाराम आदि।
  • रूकनुद्दीन के वंशज बीकानेर के प्रसिद्ध उस्ता परिवार है जो आज भी केमलहाईड चित्रण विश्व प्रसिद्ध है।
  • सर्वाधिक विकास महाराजा अनुपसिंह के समय हुआ।
  • बीकानेर के चित्रकार अपने चित्रों पर अपना नाम और तिथि लिख दिया करते थे। पर क्षेत्र के चित्रकार नहीं लिखते थे।
  • बीकानेर शैली के चित्रों का उद्देश्य भागवत गीता, कृष्णलीला, रागमाला व बारहमासा के चित्रों का चित्रण करना था।
  • विशेषता – लम्बा कद, चेहरा भरा मूंछो से ढका, भारी मांसल शरीर, बांह वाला अंगरखा, विशाल वक्ष पर कंठी, कमर में कटार, नारी आकृतियों में घेरदार लहंगा, कसा हुआ शरीर, विशाल नेत्र, आभुषणों से सुसज्जित।

नागौर शैली :-

  • नागौर शैली का विकास 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में माना जाता है।
  • इसमें जोधपुर, बीकानेर, अजमेर, मुगल और दक्षिण शैली का मिला जुला प्रभाव है।
  • नागौर शैली का सही और सर्वाधिक स्वरूप नागौर किले के महलों के भित्ति चित्रों में विशेष दृष्टव्य है।

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