Rajasthani art and culture (राजस्थानी चित्रकला शैली) Part-2

राजस्थान की कला संस्कृति Notes

Rajasthani art and culture (राजस्थानी कला एवं सस्कृति)
Rajasthani art and culture

Rajasthani art and culture (राजस्थानी चित्रकला शैली) Part-1

दोस्तों हम राजस्थान की कला संस्कृति (Rajasthan ki kala sanskriti) में राजधानी चित्रकला शैली का अध्ययन करेगे, जिसमें आपको जैसलमेर शैली, मारवाड़ी शैली, जयपुर शैली, आमेर शैली, अलवर शैली व उणियारा शैली का अध्ध्यन करेगें, जिससे आपको राजस्थानी कला एवं सस्कृति  (Rajasthani art and culture) को समझने में मदद मिलेगी।

जैसलमेर शैली:-

  •  महारावल हरराज, अखैसिंह व मूलराज मुख्य संरक्षक थे।
  • चित्र – मूमल
  •  चित्रों में रंगो का बाहुल्य है। इस शैली के चित्र अपने आप में अनोखापन लिए हुए है।
  • इस चित्रशैली पर किसी भी चित्रशैली का प्रभाव नहीं पड़ा।

मारवाड़ी शैली :-

  •  विशेषता – मरू के टीले, छोटे-छोटे झाड़ियां एवं पौधे, हिरण, ऊँट, काँवे, घोड़े।
  • इस शैली पर नाथ सम्प्रदाय का प्रभाव मानसिंह राठौड़ के समय पड़ा था। सर्वाधिक प्राणवान चित्र इसके समय में ही बने थे।
  • इसका विकास राव मालदेव के समय में हुआ।
  • मालदेव के समय चैखेलाव महल, की बल्लियों व छतों पर राम-रावण युद्ध तथा शप्तशती के अनेक अवतरंणों का चित्रांकन किया गया था।
  • कमल नयनों का अंकन, जिनकी नीचे की कोर ऊपर की ओर बढी हुई, जुल्फो का घुमाव, नीलाम्बर में गोल बादल गोल बादलों का अंकन इसकी अपनी विशेषता है।
  • रागमाला, बारहमासा, ढोला-मारू इत्यादि चित्रों का अंकन पर्याप्त मात्रा में हुआ है।
  • प्रमुख चित्रकार – भाटी शिवदास, भाटी किशनदास, भाटी देवदास, धन्ना व छोटू इत्यादि।
  • मारवाड़ी शैली में लाल और पीले रंग का प्रयोग अधिक किया गया है, जो यहो की स्थानीय विशेषता है।
  • इस शैली में पुरूष और स्त्रियाँ गठीले आकार की होती है।
  •  ऊँटो की सवारी यहां के चित्रों की प्रमुख विशेषता है।
  •  जोधपुर, बीकानेर व किशनगढ़ घरानों में विकसित हुई चित्रकला को मारवाड़ शैली के नाम से पुकारा जाता है।
  •  जोधपुर महाराजा सूरसिंह के आश्रय में ढोला-मारू भागवत (1610 में चित्रित) सचित्र ग्रंथ रचे गये। चित्रों के शीर्षक गुजराती भाषा में नागरी लिपी में थे।
  •  डालू नामक प्रसिद्ध चितेरा महाराजा अभयसिंह के दरबार में था।

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Rajasthani art and culture (राजस्थानी कला एवं सस्कृति )

जयपुर शैली :-

  •  सवाई जयसिंह के काल में दिल्ली से मुगल बादशाह औरंगजेब बेरूखी का सामना कर जयपुर आये थे।
  • जयपुर शैली का काल 1600 से 1900 माना जाता है।
  • इस शैली के चित्रों में पुरूषों के चेहरे पर चोट एवं चेचक के दागों के निशान दर्शाये गये है।
  • आँखे बड़ी-बड़ी, तीर सी मूँछे व बाल बढे़ हुए दिखाये गये है।
  • सवाई प्रतापसिंह का काल स्वर्णकाल कहलाता है।
  • चित्रकार – मुहम्मद शाह, साहिबराम, सालिगराम, रामजीदास, रघुनाथ।
  • चित्र – आदमकद, वात्स्यायन कृत-कामसूत्र व जयदेव के ’गीत गोविन्द’ आधारित चित्र।
  • रंग – केसरिया पीला, हरा व लाल रंग प्रधान।
  • आकृति – चेहरे साफ व दाढ़ी विहीन, हाथ में तलवार।
  • मुगलशैली से अत्यधिक प्रभावित। भारमल के समय से ही प्रभाव पड़ना शुरू हुआ।
  • मुगल प्रभाव के कारण राजस्थानी चित्रकला में व्यक्तिचित्र बनाने की परम्परा शुरू हुए जिन्हें सबीह कहा गया। इस प्रकार के चित्र जयपुर शैली में सर्वाधिक बने।
  • आमेर चित्रशैली में कृष्ण लीला, लैला-मंजनू, हाथी-घोड़े, कुश्ती, दंगल आदि से संबंधित चित्र बने है।
  • आदमकद और बड़े-बड़े पोट्र्रेट व भित्ति चित्रण की परम्परा जयपुर शैली की देन है।
  • ईश्वरसिंह का आदमकद चित्र साहिबराम ने बनाया था।
  • सवाई जगतसिंह ने कलाकारों को प्रोत्साहन देने के लिए ’मदरसा ए हुनरी (महाराजा स्कूल आॅफ आटर््स एण्ड क्राॅफ्ट्स)’ की स्थापना की।
  • महाराजा सवाई जयसिंह ने शासन के विभिन्न कार्यों को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने हेतु 36 कारखानों (विभागों) का गठन किया। इनमें एक मुख्य कारखाना ’सूरतखाना’ था, जिसमें कई चित्रकार बैठकर चित्रांकन का कार्य करते थे।

Rajasthani art and culture (राजस्थानी कला एवं सस्कृति ) के नोटस की PDFआपको लास्ट में मिल जायेगी, जिसे डाउनलोड जरूर कर लीजिए-

आमेर शैली :-

  • मानसिंह, मिर्जाराजा जयसिंह के काल में उभरी थी।
  • प्राकृतिक रंगो जैसे हिरमच, गैरू, कालूस, सफेदा, पेवड़ी आदि का प्रयोग।
  • आदिपुराण, रज्मनामा सचित्र भागवत यशोधर चरित्र आदि प्रमुख सचित्र ग्रंथ।
  • बिहारी सतसई पर आधारित्र चित्र भी इसी शैली में बने।
  • इस शैली की समृद्ध परंपरा भित्तिचित्रों के रूप में उपलब्ध है।

अलवर शैली :-

  • अलवर चित्रशैली का आरम्भ वहां के राजा प्रतापसिंह (1775) के समय आरंभ हुआ।
  • विनयसिंह ने महात्मा शेखसादी के ग्रंथ गुलिस्तां की पाण्डुलिपियों को गुलाम अली व बलदेव नामक चित्रकारों से चित्रित करवाया।
  • वेश्याओं के चित्र केवल अलवर शैली में ही बने है।
  • अन्य चित्र – चंठी पाठ व दुर्गा सप्तशती।
  • महाराजा विनयसिंह का शासनकाल स्वर्णकाल।
  • चित्रकार – डालचंद, नानगराम, बलदेव, गुलामअली, बुद्धाराम।
  • बलवन्त सिंह ने ’चण्डी पाठ’ पाण्डूलिपि का चित्रांकन करवाया।
  • अलवर शैली में जयपुर तथा दिल्ली शैलियों का मिश्रण दिखाई देता है। इसीलिए कई विद्वान इसे दिल्ली की मुगल शैली का विस्तारित रूप ही मानते है।
  • शैली में हरा तथा नीला रंग अधिक प्रयोग में लिया गया है। सोने के रंग का भी प्रयोग।
  • महिला आकृतियों में मछलीयों के समान आंखे, कमानी सी भौहें, नाक में नथ तथा कानों में बालियां दिखाई देती है।
  • पुरूष गले में रूमाल, कमर तक अंगरखा व पगड़ी पहने हुए दिखाई देते है।
  • अलवर शैली बसलो चित्रण के लिए जानी जाती है तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी का इस पर प्रभाव पड़ा था।
  • इस शैली के चित्रों में वन, उपवन, कुंज, विहार, महल आदि का प्रमुख रूप से चित्रांकन हुआ।
  • हाथी दांत का चित्रांकन।

उणियारा शैली :-

  • जयपुर और बुँदी की मिश्रित शैली।
  • चित्रकार – घीमा, मीरबख्श, काशी, राम, बख्ता आदि।
  • कवि केशव की कविप्रिया पर आधारित चित्र बारहमासा, राजरागिनी राजाओं के व्यक्ति चित्र व अनेक धार्मिक चित्र बने।

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